गेहूं के जवार में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट, मिनरल्स आदि वे
सभी पौष्टिक तत्व है जो शरीर को स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाये रखने
के लिए जरूरी है /
लंबे और गहन अनुसंधान के बाद पाया गया है कि शारीरिक कमजोरी, रक्ताल्पता, दमा, खांसी, पीलिया, मधुमेह, वात-व्याधि, बवासीर जैसे रोगों में गेहूं के छोटे-छोटे हरे पौधों के रस का सेवन खासा कारगर साबित हुआ है.
यहां तक कि इसकी मानवीय कोशिकाओं को फिर से पैदा करने की विशिष्ट क्षमता और उच्चकोटि के एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण कैंसर जैसे घातक रोग की प्रारंभिक अवस्था में इसका अच्छा प्रभाव देखा गया है / गेहूं हमारे आहार का मुख्य घटक है. इसमें पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है.
गेहूं के जवारे उगाने की विधि :-
(wheat grass)
1. हमेशा अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के
बीज,अच्छी उपजाऊ (उर्वरक) मिटटी और
जैविक या गोबर की उम्दा खाद का ही उपयोग करें।
2. रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक पात्र में भिगो कर रख दें।
मिटटी और खाद को अच्छी तरह मिलाकर गमलों के छेद को
पत्थर या टूटे मिटटी के गमले के टुकड़े से ढक कर गमलों में
मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और
पानी छिड़क दें।
3. पहचान के लिए सातों गमलो पर एक से सात तक नंबर डाल दें।
4. अगले दिन गेहुंओं को धो, निथारकर पहले गमले में गेहूँ को परत के रूप में बिछा
दें और ऊपर से थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से
सींच दें।
5. गमले को किसी छायादार स्थान जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता
हो पर धूप सीधी गमलों पर न पड़े।
6. अगले दिन 2 नंबर के गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज
अगले नंबर के गमले में गेहूँ बोते रहें। इनमे कभी भी
रासायनिक खाद या कीटनाषक न डाले।
7. शुरू में दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से ढक दें
और गमलों में हर रोज स्प्रे बोटल से दो बार पानी दें ताकि
मिटटी में नमी बनी रहे।
8. जब गैहूँ के ज्वारे डेढ़ इंच के हो जाये तो एक बार ही
पानी देना प्रयाप्त है। गर्मी के मौसम में ध्यान रखे कि
मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और
पानी की मात्रा भी ज्यादा न हो।
9. सात दिन बाद 5-6 पत्तियां के 7-8 इन्च लम्बे जवारे हो जाये तब इन को जड़
सहित उखाड़ कर और इनकी जड़े काट कर पानी से
अच्छी तरह धो कर पीस ले और रस निकाल ले व इसका
सेवन करे।
10. जवारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा रोग पर मल सकते हैं।
11. नियमित रूप से जवारें लेने के लिए जैसे-जैसे गमले खाली होते जाये
खाद मिटटी बदल कर नए बीज उगाते जाएँ।
12. जब तक जवारे चाहिए तब तक इस प्रक्रिया को निरंतर दोहराते रहे। इस
तरह जवारा घर में पूरे साल भर उगाया जा सकता है।
बीज,अच्छी उपजाऊ (उर्वरक) मिटटी और
जैविक या गोबर की उम्दा खाद का ही उपयोग करें।
2. रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक पात्र में भिगो कर रख दें।
मिटटी और खाद को अच्छी तरह मिलाकर गमलों के छेद को
पत्थर या टूटे मिटटी के गमले के टुकड़े से ढक कर गमलों में
मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और
पानी छिड़क दें।
3. पहचान के लिए सातों गमलो पर एक से सात तक नंबर डाल दें।
4. अगले दिन गेहुंओं को धो, निथारकर पहले गमले में गेहूँ को परत के रूप में बिछा
दें और ऊपर से थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से
सींच दें।
5. गमले को किसी छायादार स्थान जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता
हो पर धूप सीधी गमलों पर न पड़े।
6. अगले दिन 2 नंबर के गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज
अगले नंबर के गमले में गेहूँ बोते रहें। इनमे कभी भी
रासायनिक खाद या कीटनाषक न डाले।
7. शुरू में दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से ढक दें
और गमलों में हर रोज स्प्रे बोटल से दो बार पानी दें ताकि
मिटटी में नमी बनी रहे।
8. जब गैहूँ के ज्वारे डेढ़ इंच के हो जाये तो एक बार ही
पानी देना प्रयाप्त है। गर्मी के मौसम में ध्यान रखे कि
मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और
पानी की मात्रा भी ज्यादा न हो।
9. सात दिन बाद 5-6 पत्तियां के 7-8 इन्च लम्बे जवारे हो जाये तब इन को जड़
सहित उखाड़ कर और इनकी जड़े काट कर पानी से
अच्छी तरह धो कर पीस ले और रस निकाल ले व इसका
सेवन करे।
10. जवारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा रोग पर मल सकते हैं।
11. नियमित रूप से जवारें लेने के लिए जैसे-जैसे गमले खाली होते जाये
खाद मिटटी बदल कर नए बीज उगाते जाएँ।
12. जब तक जवारे चाहिए तब तक इस प्रक्रिया को निरंतर दोहराते रहे। इस
तरह जवारा घर में पूरे साल भर उगाया जा सकता है।
जवारों का रस निकालने की विधि
इन जवारों को सिल पर या मिक्सी में पिसा जा सकता है | चटनी में परिवर्तित होने के उपरांत साफ़ कपडे या चलनी से छानकर प्रतिदिन आसानी से इनका इस्तेमाल किया जा सकता है |
गेहूं के जवारों को रेफ्रिजरेटर में तीन दिन तक ताजा रखा जा सकता हैं | लेकिन एक बार इनका रस निकालने के बाद इसके रस को ज्यादा देर के लिए नहीं रखा जा सकता | ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे में इसे पीना ही होता है , नहीं तो इसकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है |
गेहूं के जवारों को रेफ्रिजरेटर में तीन दिन तक ताजा रखा जा सकता हैं | लेकिन एक बार इनका रस निकालने के बाद इसके रस को ज्यादा देर के लिए नहीं रखा जा सकता | ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे में इसे पीना ही होता है , नहीं तो इसकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है |
जवारों के प्रयोग से होने वाले प्रमुख लाभ
वैसे तो गेंहू के जवारों को हर मर्ज की दवा कहा जाता है , फिर भी कुछ खास बिमारियों के इलाज में इनसे अभूतपूर्व सफलता हासिल की गई है |
वैसे तो गेंहू के जवारों को हर मर्ज की दवा कहा जाता है , फिर भी कुछ खास बिमारियों के इलाज में इनसे अभूतपूर्व सफलता हासिल की गई है |
1. शरीर का वजन सामान्य रखने में अहम् भूमिका
2. प्रोटीन का सम्पूर्ण स्रोत
3. शारीरिक और मानसिक बल में आशातीत वृद्धि
4. मधुमेह के रोगियों के लिए बहुत कामगर
5. पाचन शक्ति को सुदृढ़ करने में अचूक औषधि
6. रक्त का शोधन और हिमोग्लोबिन के निर्माण में सहायक
7. दाग धब्बों से छुटकारा दिलाने में मददगार
8. आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में मौजुदगी के कारण कैंसर मरीजों के लिए उपयोगी 9. इसके अलावा बवासीर , गठिया , खांसी और कई पुराने रोगों को ठीक करने में भी इससे काफी मदद मिली है |10.वृद्धावस्था की कमजोरी दूर करने में गेहूँ के जवारे का रस किसी भी उत्तम टानिक से कम नहीं, वरन् अधिक ही उत्तम सिद्ध हुआ है। 11. यह एक ऐसा प्राकृतिक टानिक है जिसे हर आयुवर्ग के नर - नारी जब तक चाहें प्रयोग कर सकते हैं। अंग्रेजी दवाओं - टानिकों का अधिक दिनों तक सेवन नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे लाभ के स्थान पर नुकसान ज्यादा पहुँचाते हैं। परन्तु इस रस के साथ ऐसी कोई बात नहीं। पोषकता, गुणवत्ता एवं हरे रंग के कारण गेहूँ के पौधे के रस को ‘ग्रीन ब्लड’ की संज्ञा दी गयी है। 12. गेहूँ के ताजे जवारे के साथ यदि थोड़ी - सी हरी दूब - दूर्बाघास एवं 2 - 4 दाने कालीमिर्च को पीसकर रस निकाला और उसका सेवा किया जाए तो पुराने से पुराना एलर्जिक रोग भी जड़ - मूल से नष्ट हो जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होकर युवाओं जैसी स्फूर्ति आ जाती है। यहाँ ध्यान रखने योग्य विशेष बात यह है कि दूर्बाघास सदैव साफ-स्वच्छ स्थानों जैसे खेत, बाग, बगीचों, की ही प्रयुक्त की जानी चाहिए। इसे भी छोटे गमलों, क्यारियों, में गेहूँ की भाँति ही उगाया जा सकता है। नोट:- 1. शुरू में रस पीने से परेशानी हो तो कम मात्रा से धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें। 2. ज्वारे का ताजा रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये। 3. यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं। 4. रस निकालकर तुरंत उपयोग करें। तीन घण्टे में जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त होने लगते हैं। 5. रस में अदरक अथवा खाने वाला पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है। 6. इसे गिलोय, लोकी, नीम के पत्तो व तुलसी के पत्तों के रस के साथ भी मिल कर लिया जा सकता है। 7. रस लेने के पूर्व व बाद में एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें। आधे घंटे में यह रक्त में घुल मिल जाता है। 8. रस को धीरे-धीरे घूंट घूंट करके पीना चाहिए और सादा भोजन ही लेना चाहिए तथा तली हुई वस्तुएं न खाए 9. कुछ लोगों को शुरु-2 में उल्टी-दस्त हो सकते है तथा सर्दी महसूस हो सकती है। यह सब रोगी होने के लक्षण है। 10. खटाई ज्वारे के रस में मौजूद एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी आदि भी नहीं मिलाना चाहिये। 11. सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से ऐसा समझे की शरीर से दूषित एकत्रित मल बाहर निकल रहा है, इससे घबराने की जरुरत नहीं है। 12. इसे खट्टे रसों (नीबू, संतरा, मौसमी) आदि खट्टे रसो को छोड़कर अन्य फलों और सब्जियों के रस के साथ मिला कर भी ले सकते है।
2. प्रोटीन का सम्पूर्ण स्रोत
3. शारीरिक और मानसिक बल में आशातीत वृद्धि
4. मधुमेह के रोगियों के लिए बहुत कामगर
5. पाचन शक्ति को सुदृढ़ करने में अचूक औषधि
6. रक्त का शोधन और हिमोग्लोबिन के निर्माण में सहायक
7. दाग धब्बों से छुटकारा दिलाने में मददगार
8. आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में मौजुदगी के कारण कैंसर मरीजों के लिए उपयोगी 9. इसके अलावा बवासीर , गठिया , खांसी और कई पुराने रोगों को ठीक करने में भी इससे काफी मदद मिली है |10.वृद्धावस्था की कमजोरी दूर करने में गेहूँ के जवारे का रस किसी भी उत्तम टानिक से कम नहीं, वरन् अधिक ही उत्तम सिद्ध हुआ है। 11. यह एक ऐसा प्राकृतिक टानिक है जिसे हर आयुवर्ग के नर - नारी जब तक चाहें प्रयोग कर सकते हैं। अंग्रेजी दवाओं - टानिकों का अधिक दिनों तक सेवन नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे लाभ के स्थान पर नुकसान ज्यादा पहुँचाते हैं। परन्तु इस रस के साथ ऐसी कोई बात नहीं। पोषकता, गुणवत्ता एवं हरे रंग के कारण गेहूँ के पौधे के रस को ‘ग्रीन ब्लड’ की संज्ञा दी गयी है। 12. गेहूँ के ताजे जवारे के साथ यदि थोड़ी - सी हरी दूब - दूर्बाघास एवं 2 - 4 दाने कालीमिर्च को पीसकर रस निकाला और उसका सेवा किया जाए तो पुराने से पुराना एलर्जिक रोग भी जड़ - मूल से नष्ट हो जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होकर युवाओं जैसी स्फूर्ति आ जाती है। यहाँ ध्यान रखने योग्य विशेष बात यह है कि दूर्बाघास सदैव साफ-स्वच्छ स्थानों जैसे खेत, बाग, बगीचों, की ही प्रयुक्त की जानी चाहिए। इसे भी छोटे गमलों, क्यारियों, में गेहूँ की भाँति ही उगाया जा सकता है। नोट:- 1. शुरू में रस पीने से परेशानी हो तो कम मात्रा से धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें। 2. ज्वारे का ताजा रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये। 3. यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं। 4. रस निकालकर तुरंत उपयोग करें। तीन घण्टे में जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त होने लगते हैं। 5. रस में अदरक अथवा खाने वाला पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है। 6. इसे गिलोय, लोकी, नीम के पत्तो व तुलसी के पत्तों के रस के साथ भी मिल कर लिया जा सकता है। 7. रस लेने के पूर्व व बाद में एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें। आधे घंटे में यह रक्त में घुल मिल जाता है। 8. रस को धीरे-धीरे घूंट घूंट करके पीना चाहिए और सादा भोजन ही लेना चाहिए तथा तली हुई वस्तुएं न खाए 9. कुछ लोगों को शुरु-2 में उल्टी-दस्त हो सकते है तथा सर्दी महसूस हो सकती है। यह सब रोगी होने के लक्षण है। 10. खटाई ज्वारे के रस में मौजूद एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी आदि भी नहीं मिलाना चाहिये। 11. सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से ऐसा समझे की शरीर से दूषित एकत्रित मल बाहर निकल रहा है, इससे घबराने की जरुरत नहीं है। 12. इसे खट्टे रसों (नीबू, संतरा, मौसमी) आदि खट्टे रसो को छोड़कर अन्य फलों और सब्जियों के रस के साथ मिला कर भी ले सकते है।
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