Friday, 18 December 2015

ह्रदय के रोगों के सरल उपचार



हृदय शरीर का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। मानवों में यह छाती के मध्य में, थोड़ी सी बाईं ओर स्थित होता है और एक दिन में लगभग एक लाख बार एवं एक मिनट में 60-90 बार धड़कता है। यह हर धड़कन के साथ शरीर में रक्त को धकेलता करता है।हृदय को पोषण एवं ऑक्सीजन, रक्त के द्वारा मिलता है जो कोरोनरी धमनियों द्वारा प्रदान किया जाता है। यह अंग दो भागों में विभाजित होता है, दायां एवं बायां। हृदय के दाहिने एवं बाएं, प्रत्येक ओर दो चैम्बर (एट्रिअम एवं वेंट्रिकल नाम के) होते हैं। कुल मिलाकर हृदय में चार चैम्बर होते हैं। दाहिना भाग शरीर से दूषित रक्त प्राप्त करता है एवं उसे फेफडों में पम्प करता है और रक्त फेफडों में शोधित होकर ह्रदय के बाएं भाग में वापस लौटता है जहां से वह शरीर में वापस पम्प कर दिया जाता है। चार वॉल्व, दो बाईं ओर (मिट्रल एवं एओर्टिक) एवं दो हृदय की दाईं ओर (पल्मोनरी एवं ट्राइक्यूस्पिड) रक्त के बहाव को निर्देशित करने के लिए एक-दिशा के द्वार की तरह कार्य करते हैं।
हृदय की मांसपेशिया जीवंत होती है और उन्हें जिन्दा रहने के लिए आहार और ऑक्सीजन चाहिए। जब एक या ज्यादा आर्टरी अवरूद्ध हो जाती है तो हृदय की कुछ मांसपेशियों को आहार और ऑक्सीजन नही मिल पाती। इस अवस्था को हार्ट अटैक यानी दिल का दौरा कहते हैं। ( इस सिलसिले में कुछ लोगो को भ्रम हो सकता है कि दिल से संबंधित और भी समस्याएं होती हैं जैसे – हार्ट वॉल्व की समस्या, कंजीनाइटल हार्ट प्रॉब्लम आदि, और जब हम दिल की बीमारियों की बात करते हैं तो आमतौर पर इन्हें शामिल नही किया जाता परन्तु यह समस्याएँ भी हृदय रोग से सम्बंधित होती है
दिल की बीमारी का इलाज के लिए चित्र परिणाम
मनुष्य का हृदय एक मिनट में तकरीबन 70 बार धडकता है। चौबीस घंटों में 1,00,800 बार। इस तरह हमारा हृदय एक दिन में तकरीबन 2000 गैलन रक्त का पम्पिंग करता है।' 
हृदय रोग के कारण -
युवावस्था में हृदयरोग होने का मुख्य कारण अजीर्ण व धूम्रपान(smoking) है। धूम्रपान न करने से हृदयरोग की सम्भावना बहुत कम हो जाती है। फिर भी उच्च रक्तचाप, ज्यादा चरबी,कोलेस्ट्रोल अधिक होना, अति चिंता करना और मधुमेह भी इसके कारण हैं।
मोटापा, मधुमेह, गुर्दों की अकार्यक्षमता, रक्तचाप, मानसिक तनाव, अति परिश्रम,मल-मूत्र की हाजत को रोकने तथा आहार-विहार में प्राकृतिक नियमों की अवहेलना से ही रक्त में वसा का प्रमाण बढ़ जाता है। अतः धमनियों में कोलस्ट्रोल के थक्के जम जाते हैं,जिससे रक्त प्रवाह का मार्ग तंग हो जाता है। धमनियाँ कड़ी और संकीर्ण हो जाती हैं।

अधिक वज़न।

 शारीरिक श्रम की कमी।
 अधिक वसा व कोलेस्ट्रॉलयुक्त खाना।
 तनाव एवं धूम्रपान। अधिक शराब पीना।
 परिवार के अन्य सदस्यों को हार्ट अटैक की समस्या।

हृदय रोग के लक्षण -
हार्ट अटैक कई लोगों के लिए मृत्यु का कारण बनता है। इससे मरने वाले करीब एक तिहाई मरीज़ों को तो यह पता ही नहीं होता कि वे हृदय रोगी हैं और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। इसके लिए ज़िम्मेदार एक बड़ा कारण यह है कि पहले आए हार्ट अटैक को मरीज़ ने पहचाना ही न हो। ऐसा हार्ट अटैक,जिसके लक्षण अस्पष्ट हों या जिनका पता ही न चले,उसे साइलेंट हार्ट अटैक कहते हैं ।

1.छाती में बायीं ओर या छाती के मध्य में तीव्र पीड़ा होना या दबाव सा लगना,जिसमें कभी पसीना भी आ सकता है और श्वास तेजी से चल सकता है।
2.कभी पेट में जलन, भारीपन लगना, उलटी होना, कमजोरी सी लगना, ये तमाम लक्षण हृदयरोगियों में देखे जाते हैं।
3.दिल के दौरे के लक्षणों में व्यायाम के साथ थकान शामिल है। सांस रोकने में तकलीफ, रक्त जमना और फेफड़ों में द्रव जमा होना तथा पैरों, टखनों और टांगो में द्रव जमा होना।
 इसका आयुर्वेदिक इलाज -
1.धूम्रपान दिल का दौरा पड़ने का एक बहुत बड़ा कारण है। आंकड़े बताते हैं कि 65 साल के कम उम्र के एक तिहाई लोगों में क्रोनिक हर्ट डिजीज का मुख्य कारण धूम्रपान होता है।
2.रिसर्च बताते हैं कि मानसिक तनाव भी दिल का दौरा पड़ने का एक अहम कारण है। कई बार तनाव दूर करने के लिए लोग ड्रिंक, धूम्रपान या ओवरईटिंग का सहारा लेने लगते हैं, जिससे हृदय की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए तनाव से दूर रहें और हृदय को स्वस्थ रखें।
3.हररोज ध्यान में एक घंटा बैठना, श्वासोछ्वास की कसरतें अर्थात् प्राणायाम, आसन करना, हर रोज आधा घंटा घूमने जाना तथा चरबी न बढ़ाने वाला सात्त्विक आहार लेना अत्यंत लाभकारी है।
4.पहले दिन 1 किशमिश रात को गुलाबजल में भिगोकर सुबह खाली पेट चबाकर खा लें, दूसरे दिन दो किशमिश खायें। इस तरह प्रतिदिन 1 किशमिश बढ़ाते हुए 21 वें दिन 21 किशमिश लें फिर 1-1 किशमिश प्रतिदिन कम करते हुए 20, 19, 18 इस तरह 1 किशमिश तक आयें। यह प्रयोग करके थोड़े दिन छोड़ दें। 3 बार यह प्रयोग करने से उच्च रक्तचाप नियंत्रण में रहता है।
5.खाने में लाल मिर्च, तीखे मसाला आदि एक निर्धारित मात्रा में ही सब्जी में डालें तथा ज्यादा तली चीजें, तेल युक्त अचार आदि बहुत कम मात्रा में लें।
6. 2 कली लहसुन रोजाना दिन में 2 बार सेवन करें।
7. 200 ग्राम दूध में 200 ग्राम पानी मिलाकर हलकी आग पर रखें, फिर 3 ग्राम अर्जुन छाल का चूर्ण मिलाकर उबालें। उबलते उबलते द्रव्य आधा रह जाय तब उतार लें। थोड़ा ठंडा होने पर छानकर रोगी को पिलायें।
सेवन विधि - रोज 1 बार प्रातः खाली पेट लें उसके बाद डेढ़ दो घंटे तक कुछ न लें। 1 माह तक नित्य सेवन से दिल का दौरा पड़ने की सम्भावना नहीं रहती है।
8.50 ग्राम उड़द की दाल रात को बर्तन में भिगों लें और सुबह इसको पीसकर आधा गिलास दूध में मिश्री घोलकर पीते रहने से दिल की कमजोरी दूर होगी और दिल को दौरे पड़ने की संभावना न के बराबर हो जाएगी।
9.लौकी का सेवन करना भी दिल की सेहत के लिए फायदेमंद होता है। लौकी को उबालकर उसमें जीरा, हल्दी का पाउडर और हरा धनियां डालकर कुछ देर तक पकाकर खाएं। यह हर्ट अटैक से दिल को बचाने में लाभकारी है।

वजन बढ़ाने के आसान तरीके

वजन बढ़ाने के आसान तरीके

आज ज्यादातर लोग बढ़ते हुये वजन को कम करने कि कवायद में लगे रहते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कम वजन की समस्या से गुज़र रहे हैं । तेजी से वजन बढ़ाने के लिए लोगों द्वारा बाजार के महंगे उत्पाद खरीदे जाते हैं लेकिन इस तरह के उत्पाद हमारे लिए सुरक्षित हैं या नहीं ये जानना बहुत ज़रूरी होता है । कुछ प्राकृतिक तरीके हैं जिनसे बिना किसी साइड इफेक्ट के बजन बढाया जा सकता है ।
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कम वजन के कारण

* पाचन शक्ति में गड़बड़ी के कारण व्यक्ति अधिक दुबला हो सकता है।
* मानसिक, भावनात्मक तनाव, चिंता की वजह से व्यक्ति दुबला हो सकता है।
* यदि शरीर में हार्मोन्स असंतुलित हो जाए तो व्यक्ति दुबला हो सकता है।
* चयापचयी क्रिया में गड़बड़ी हो जाने के कारण व्यक्ति दुबला हो सकता है।
* बहुत अधिक या बहुत ही कम व्यायाम करने से भी व्यक्ति दुबला हो सकता है।
* आंतों में टमवोर्म या अन्य प्रकार के कीड़े हो जाने के कारण भी व्यक्ति को दुबलेपन का रोग हो सकता है।
* मधुमेह, क्षय, अनिद्रा, जिगर, पुराने दस्त या कब्ज आदि रोग हो जाने के कारण व्यक्ति को दुबलेपन का रोग हो जाता है।
* शरीर में खून की कमी हो जाने के कारण भी दुबलेपन का रोग हो सकता है।
 घरेलू  उपाय :-
1.वजन बढ़ाने के लिए आयुर्वेदिक नुस्खों को अपनाने से किसी तरह को कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता।
2.च्यवनप्राश - च्यवनप्राश सुबह -शाम दूध के साथ सेवन करते रहें।
3.आयुर्वेद में अश्वगंधा और सतावरी  के उपयोग से वजन बढाने का उल्लेख मिलता है।३-३  ग्राम  दोनों रोज सुबह लं का चूर्ण दूध के साथ प्रयोग करें।
4.दूध को अवश्य पियें - दूध को नाश्ते एवम रात्रि में सोते समय ले | दूध के साथ दो केले खाने से भी वजन बढ़ता हैं |
 5.रोज सुबह ३-४ किलोमीटर  घूमने का नियम बनाएं।
6. भोजन खूब अच्छी तरह से चबा चबा कर खाना चाहिये। दोनों वक्त शोच निवृत्ति की आदत डालें।
अखरोट में आवश्यक मोनोअनसेचुरेटेड फैट होता है जो स्वस्थ कैलोरी को उच्च मात्रा में प्रदान करता है। रोज़ 20 ग्राम अखरोट खाने से वजन तेजी से प्राप्त होगा। 

7.नियमित योग : वजन बढ़ाने के लिए भोजन का सही तरह से पाचन आवश्यक हैं जिसके लिए शारीरिक श्रम जरुरी हैं जिसमे आप जिम, नियमित वाक, योग अथवा प्राणायाम कर सकते हैं | सूर्य नमस्कार एक अत्यंत प्रभावशाली क्रिया हैं जिसे आप अपने जीवन का हिस्सा बनाये जो आपको सुन्दर एवम स्वस्थ जीवन देगा |जिम में आप स्क्वेट, डेड लीफ, बेंच प्रेस जैसे पेशीय व्यायाम करें जिससे शरीर में मांसपेशी बढ़ेगी और शरीर मजबूत होगा जिससे दुर्बलता खत्म होगी |

8.नींद बहुत आवश्यक हैं : जिस तरह पानी, भोजन, स्वांस जीवन के लिए जरुरी हैं उसी प्रकार नींद भी बहुत आवश्यक हैं | शरीर को नियमित योग के साथ आराम बहुत जरुरी हैं इससे metabolism बढ़ता हैं जो शरीर के दुबले अथवा मोटे होने का मुख्य कारण हैं |नींद ना आना भी दुबले होने का एक मुख्य कारण हैं अगर आप उचित व्यायाम कर रहे हैं तो आपको अवश्य नींद आएगी | जिम में वजनी व्यायाम के बाद शरीर को आराम गहरी और अच्छी नींद से ही मिलता हैं| फिर भी कोई परेशानी हैं तो डॉक्टर से बात करे | नींद को कभी नजरंदाज ना करें |

9. नारियल का दूध - यह आहार तेलों का समृद्ध स्रोत है और भोजन के लिए अच्छा तथा स्वादिस्ट जायके के लिए जाना जाता है। नारियल के दूध में भोजन पकाने से खाने में कैलोरी बढ़ेगी। जिससे आपके वजन में वृधि होगी।

10.बीन्स-बीन्स के एक कटोरी में 300 कैलोरी होती है। यह सिर्फ वजन बढ़ने में ही मदत नहीं करता बल्कि पौष्टिक भी होता है। 

Sunday, 13 December 2015

रोज दो आंवला खाइए, उम्र घटाइए!

        रोज दो आंवला खाइए, उम्र घटाइए!

आयुर्वेद में आंवले को जो सम्मान हासिल है वह किसी दूसरे फल, जड़ी अथवा बूटी को नहीं मिलता। यह Vitamin C का सर्वोत्तम स्रोत है। इसके अलावा इसमें गैलिक एसिड, टैनिक एसिड, शर्करा तथा कैल्शियम भी पाया जाता है। आंवले के रस में संतरे के रस की तुलना में 20 गुना अधिक विटामिन सी पाया जाता है। सुबह प्रतिदिन खाली पेट दो आंवला खाने या फिर रात में सोने से ठीक पहले एक चम्‍मच आंवले का चूर्ण एक घूंट पानी के साथ लेने का प्रभाव आप एक महीने में खुद महससू करेंगे।
आंवला के लिए चित्र परिणाम

गुण : आंवले को आयुर्वेद में 'रसायन' वर्ग में रखा गया है। अर्थात यह शरीर का पोषण करने के गुण रख़ता है। आधुनिक संदर्भ में इसे बेहतरीन एंटी ऑक्सीडेंट माना गया है। अत: इसके सेवन से व्यक्ति सदा स्वस्थ रहता है। आंवला फल के सीधे सेवन के अलावा चूर्ण एवं स्वरस के रूप में इसका सेवन किया जा सकता है। 
जुकाम : -* 2 चम्मच आंवले के रस को 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर सुबह और शाम चाटने से जुकाम ठीक हो जाता है।
* जिन लोगों को अक्सर हर मौसम में जुकाम रहता है उन लोगों को आंवले का सेवन रोजाना करने से लाभ होता है।दस्त : -
* आंवले को पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर 3 ग्राम की मात्रा में लेकर सेंधानमक मिलाकर दिन में कई बार पानी के साथ पीने से दस्त का आना बंद हो जाता है।
* सूखे आंवले को नमक और थोड़ा पानी डालकर 4 ग्राम के रूप में दिन में 4 बार खाने से लाभ मिलता है।
* सूखे आंवले को पीसकर चूर्ण बना लें, फिर इसी चूर्ण में कालानमक डालकर पानी के साथ इस्तेमाल करने से पुराने दस्त में लाभ मिलता है।
* आंवले को सुखाकर 250 ग्राम पानी में मिलाकर पीसकर नाभि के चारों तरफ लगा दें, नाभि में अदरक का रस लगाकर और थोड़ा-सा पिलाने से आतिसार मिटता है।

आंवले का घरेलू प्रयोग* अतिसार: कच्चा आंवला पीस कर रोगी की नाभि के चारों ओर कटोरी जैसी बनाकर इस नाभि में अदरक का रस भर देंहिचकी: आंवला, कैथ का गूदा, छोटी पीपर का चूर्ण, शहद से चटाएं तो हिचकियां मिट जाएंगीअजीर्ण: ताजा आंवला, अदरक, हरा धनिया मिलाकर चटनी बनावें इसमें सेंधा नमक, काला नमक, हींग, जीरा, काली मिर्च मिला चटावें। डकारें आएंगी, भूख खुलेगी, हाजमा बढ़ेगास्त्रियों का बहुमूत्र: आंवले का रस, पका हुआ केले का गूदा, शहद व मिश्री चारों मिलाकर चटाएंमूत्र कष्ट: आंवले का 25 ग्राम ताजा रस, छोटी इलायची के बीजों का चूर्ण कर पिलाएं। मूत्र आने लगेगाबवासीर: आंवले पीस कर पीठी को मिट्टी के बर्तन में लेप कर दें। इसमें गाय की ताजा छाछ भर रोगी को पिलाएंमुंह के छाले और घाव: आंवले के पत्तों के काढे से दिन में 2 से 3 बार कुल्ले कराएंश्वेत प्रदर: आंवले की गुठली फोड़ कर निकाले बीजों का चूर्ण पानी से पीस कर शहद व मिश्री मिला पिलाएंनेत्रों के रोग: आंवला छिलका दरदरा कूट कर पानी में भिगोकर रखें। इसे कपड़े से साफ छान कर दिन में तीन बार 2-2 बूंद आंखों में टपकाएं
चरबी कम करता है
आंवले में मौजूद गुण शरीर के मेटाबोल्जिम को ठीक बनाकर रखते हैं जिस वजह से शरीर में मौजूद अत्याधिक चरबी घटती है। आंवले में मिनरल और प्रोटीन की सही मात्रा होती है। इसलिए वजन घटाने में बेहद फायदेमंद होता है। आंवला पेट संबंधी बीमारियां जैसे कब्ज, पेट दर्द आदि को दूर करता है और पेट को साफ बनाता है।
आंवले का फल
यदि आप आंवले के फायदों और इसके हितकारी गुणों के बारे में जानकर सुबह कच्चा आंवला खा सकते हो तो आपके शरीर में फाइबर की मात्रा अधिक बढ़ेगी और वजन कम होगा। नियम बनाएं 1 कच्चा आंवला सुबह खाली पेट।
पुरानी कब्ज और वजन घटाएं
आंवले में खाना पचाने की शक्ति होती है। जो पुरानी से पुरानी कब्ज मे राहत देती है। और इस गुण से वजन कम करने में आसानी होती है साथ ही शरीर मे उर्जा और चेहरा साफ होता है।
सूखे आंवले का प्रयोग
आंवला पूरे साल नहीं मिलता है लेकिन आप आवलें को सूखाकर भी प्रयोग में ला सकते हो। आप सूखे आंवलों को चीनी की चाशनी में डालकर भी सेवन कर सकते हो।
मुरब्बे का प्रयोग
आंवले का मुरब्बा वजन कंट्रोल करने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए आप आंवले के मुरब्बे का प्रयोग भी कर सकते हो। पूरे साल आंवला नहीं मिलता है इसलिए आप मुरब्बे के रूप में इसे रख सकते हो।
आंवले का पउडर
यदि आप कच्चा आंवला नहीं ले सकते हो तो आंवले का चूर्ण आपको आसानी से बाजार में मिल जाता है। आप चूर्ण का प्रयोग उसमें दिए गए नियमो के हिसाब से कर सकते हो।

आंवला प्राकृति का अनमोल तोफा है। जो आपकी सेहत के लिए बेहद आवश्यक है। यदि आंवला आप अपने डायट में डेली सेवन करोगे तो आप कभी भी बीमार नहीं पड़ोगे साथ ही आपका वजन हमेंशा नियंत्रण में रहेगा। आंवले में मौजूद गुण आपकी अत्याधिक चर्बी को तो कम करते ही हैं। साथ ही आपको त्वचा संबंधी बीमारियों से भी बचाते हैं।

Saturday, 12 December 2015

बीमारियों से दूर रखता है विटामिन बी 12

  बीमारियों से दूर रखता है विटामिन बी 12

विटामिन बी 12 VEG. FOOD के लिए चित्र परिणाम

भोजन में मौजूद हर विटामिन तथा खनिज तत्व शरीर को पोषण देने में काफी सहायक सिद्ध होता है।विटामिन बी १२ एक ऐसा विटामिन है जो मनुष्यों की स्मरणशक्ति को बढ़ाता है। अगर किसी मनुष्य के शरीर में विटामिन बी १२ की कमी है तो इससे उन लोगों के मस्तिष्क पर असर पड़ेगा जो युवावस्था पार करके बुढ़ापे में प्रवेश कर चुके हैं। एक शोध के अनुसार ज़्यादातर लोग, जिनके शरीर में विटामिन बी १२ की कमी थी, एक ज्ञानात्मक परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो पाए। उनके दिमाग की mri करवाने पर उसका वज़न भी कम निकला।
उम्र बढ़ने के साथ ही एक मनुष्य की काम करने की क्षमता तथा मस्तिष्क की प्रबलता कम होती जाती है। क्योंकि इनके शरीर में विटामिन बी १२ की कमी होती है अतः इनपर इसका खराब असर पड़ता है।वैसे तो विटामिन बी १२ की कमी से हर मनुष्य के स्वास्थ्य पर खराब असर पड़ता है परन्तु उम्रदराज लोगों पर इसका असर कुछ ज़्यादा ही पड़ता है। अतः इस कमी के बारे में आपको जानकारी होनी चाहिए।
शरीर में विटामिन बी १२ की कमी के कुछ लक्षण -
१. चलने में असुविधा
२. त्वचा का पीला पड़ना
३. हाथ तथा पैरों में अजीब सी सनसनी का अनुभव
४. ज्वलनशील और सूजी जीभ
५. थकान
६. मतिभ्रम
७. सोचने समझने में परेशानी
८. याददाश्त खोना
खानपान में विटामिन बी-12 -
अक्सर यह सवाल उठता है कि हमें अपने खानपान में किन चीजों को शामिल करना चाहिए, ताकि शरीर में विटामिन बी-12 की कमी न हो। हालांकि मांसाहारी पदार्थों में विटामिन बी 12 की भरपूर मात्रा होती है, परन्तु शाकाहारी लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए। विटामिन बी-12 के कुछ मुख्य स्रेत है। हमें डेरी उत्पादों का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए जैसे दूध, दही, पनीर, चीज, मक्खन, सोया मिल्क आदि। इसके अलावा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि में भी विटामिन बी 12 आंशिक रूप से पाया जाता है।
इस मात्रा में चाहिए शरीर को विटामिन-
शरीर को प्रतिदिन 2.4 माइक्रोग्राम विटामिन बी 12 आवश्यकता होती है और हमारे शरीर ने इसकी अधिक मात्रा को एकत्र रखने और जरूरत के हिसाब से उसका उपयोग करने के तंत्र में अपने को ढाला हुआ है। नई आपूर्ति के बिना भी हमारा शरीर बी12 को 30 वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है क्योंकि अन्य विटामिनों के विपरीत, यह हमारी मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों विशेषकर यकृत में भंडारित रहता है।
क्‍यों होती है बी12 की कमी? - 
जान लें कि, बी12 की कमी के अधिकांश मामले दरअसल उसके अवशोषण की कमी के मामले होते हैं क्योंकि चालीस पार के लोगों की बी12 अवशोषण की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। बहुत सी दवाइयां भी लम्बे समय तक प्रयोग किए जाने पर बी12 के अवशोषण को अस्थाई रूप से या सदा के लिए बाधित करती हैं। इसके अलावा भोजन में नियमित रूप से बी12 की अधिकता होने पर शरीर उसकी आरक्षित मात्रा में कमी कर देता है। बी-12 की कमी कई कारणों से पाई जाती है, जिनमें जीवनशैली संबंधी गलत आदतें तथा जैव रासायनिक खपत संबंधी समस्याएं शामिल हैं। हाल ही के एक शोध की मानें तो भारत की लगभग 60-70 प्रतिशत जनसंख्या और शहरी मध्यवर्ग का लगभग 80 प्रतिशत विटामिन बी-12 की कमी से पीड़ित है।
सिर्फ मांसाहार ही विकल्प नहीं
ऐसा नहीं कि सिर्फ मांसाहार वाले ही इस विटामिन की कमी से महफूज रहते हों। मांस में भी यह जिन अवयवों में अधिक मात्रा में पाया जाता है, उन भागों को तो अधिकांश मांसाहारी भी अभक्ष्य मानते हैं, इसलिए शाकाहारी लोग भी खमीर, अंकुरित दालों, शैवालों, दुग्ध-उत्पादों यथा दही, पनीर, खोया, चीज, मक्खन, मट्ठा, सोया मिल्क आदि तथा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि की सहायता से बी12 की पर्याप्त मात्रा प्राप्त कर सकते हैं, और भोजन में गाहे-बगाहे खमीरी रोटी और स्पाइरुलिना भी ले लिया करें तो अच्छा है। विशेषकर यदि आप चालीस के निकट हैं या उससे आगे पहुंच चुके हैं। हां, अच्छी बात यह भी है कि इसकी दवा की मात्रा मर्ज की गंभीरता पर निर्भर करती है और इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। यह दवा आंतों में मौजूद लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया को सक्रिय करने का काम करती है।
अगर आपके मन में अपने शरीर में विटामिन बी १२ की कमी को लेकर दुविधा है तो आपको एक अच्छे डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। वो आपको शारीरिक जांच एवं रक्त की जांच करने के लिए कहेंगे जिससे कि वो आपकी स्थिति अच्छे से समझ पाएं। अगर आपने इसका इलाज जल्द नहीं किया तो काफी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

Friday, 11 December 2015

पीपल के पेड़ के औषधीय गुण



             पीपल के पेड़ के औषधीय गुण



पीपल के उपयोग के लिए चित्र परिणाम

1.यह 24 घंटे ऑक्सीजन देता है |

2. इसके पत्तों से जो दूध निकलता है उसे आँख में 


लगाने से आँख का दर्द ठीक हो जाता है|

3. पीपल की ताज़ी डंडी दातून के लिए बहुत अच्छी


है |

4.पीपल के ताज़े पत्तों का रस नाक में टपकाने से 

नकसीर में आराम मिलता है |

5. हाथ -पाँव फटने पर पीपल के पत्तों का रस या दूध लगाए |


6.पीपल की छाल को घिसकर लगाने से फोड़े फुंसी और घाव और जलने से हुए घाव भी ठीक हो जाते है| 


7.सांप काटने पर अगर चिकित्सक उपलब्ध ना हो तो पीपल के पत्तों का रस 2-2 चम्मच ३-४ बार पिलायें


.विष का प्रभाव कम होगा |

8.इसके फलों का चूर्ण लेने से बांझपन दूर होता है और पौरुष में वृद्धि होती है |


9. पीलिया होने पर इसके ३-४ नए पत्तों के रस का मिश्री मिलाकर शरबत पिलायें .३-५ दिन तक दिन में दो 


बार दे |

10 इसके पके फलों के चूर्ण का शहद के साथ सेवन करने से हकलाहट दूर होती है और वाणी में सुधार होता है |

11. इसके फलों का चूर्ण और छाल सम भाग में लेने से दमा में लाभ होता है |


12. इसके फल और पत्तों का रस मृदु विरेचक है और बद्धकोष्ठता को दूर करता है |


13. यह रक्त पित्त नाशक , रक्त शोधक , सूजन मिटाने वाला ,शीतल और रंग निखारने वाला है
|



झुर्रियों से बचाएगा

बहुत ही कम लोगों को ही यह बात मालूम है कि झुर्रियों को खत्म करने के लिए पीपल एक अहम भूमिका निभाता है। यह बढ़ती हुई उम्र की वजह से चेहरे पर झुर्रियां रोक देता है। पीपल की जड़ों को काट लें और उसे पानी में अच्छे से भिगोकर इसका पेस्ट बना लें। और इस पेस्ट को नियमित चेहरे पर लगाएं।
दाद और खुजली को दूर करे
दाद और खाज दूर करने के लिए पीपल के 4 पत्तों को चबाकर सेवन करें। यदि एैसा नहीं कर सकते हो तो पीपल के पेड़ की छाल का काढ़ा बना लें और इसे दाद व खुजली वाली जगह पर लगाएं।
पेट की तकलीफ को दूर करे
पेट की किसी भी तरह की समस्या जैसे कब्ज, गैस और पेट दर्द आदि को  दूर करता है। पीपल के ताजे पत्तों को कूट कर इसका रस सुबह-शाम पीएं। पीपल के पत्ते वात और पित्त को खत्म करते हैं।            
दमा से दिलाए निजात
दमा के रोगीयों के लिए पीपल एक महत्वपूर्ण दवा का काम करता है। पीपल के पेड़ की छाल के अंदर के हिस्से को निकाल लें और इसे सुखा लें। सूखने के बाद इसका बारीक चूर्ण बना लें और पानी के साथ दमा रोगी को दें।
नजला-जुकाम से मुक्ति
नजला-जुकाम होने पर पीपल के पत्तों को छाया में सुखा लें। और इनकों पीसकर चूर्ण बना लें। और इसे गुनगुने पानी में थोड़ी सी मिश्री के साथ मिलाकर पीएं।

घावों को करे ठीक
चोट के घावों को जल्दी भरने के लिए पीपल के पत्तों को गर्म कर लें और चोट की वजह से होने वाले घावों पर लगा दें।

दिलाए फटी एड़ियों से निजात
पीपल के पत्तों से निकलने वाले दूध को फटी एड़ियों पर लगाने से एड़ियां कोमल और सामान्य हो जाती हैं।


Wednesday, 9 December 2015

चना शरीर को बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाता है।

                        चने के फायदे

आयुर्वेद में चने की दाल और चने को शरीर के लिए स्वास्थवर्धक बताया गया है। चने के सेवने से कई रोग ठीक हो जाते हैं। क्योंकि इसमें प्रोटीन, नमी, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, कैल्शियम और विटामिन्स पाये जाते हैं। चना दूसरी दालों के मुकाबले सस्ता होता है और सेहत के लिए भी यह दूसरी दालों से पौष्टिक आहार है। चना शरीर को बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाता है। साथ ही यह दिमाग को तेज और चेहरे को सुंदर बनाता है। चने के सबसे अधिक फायदे इन्हे अंकुरित करके खाने से होते है। 

अंकुरित चने के लिए चित्र परिणाम
चना खाये स्वाथ्य रहे --
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चना और चने की दाल दोनों के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है।
चने को गरीबों का बादाम कहा जाता है, क्योंकि ये सस्ता होता है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नमी, चिकनाई, रेशे, कैल्शियम, आयरन व विटामिन्स पाए जाते हैं। लेकिन इसी सस्ती चीज में बड़ी से बड़ी बीमारियों की लड़ने की क्षमता है। चना खाने से अनेक रोगों की चिकित्सा हो जाती है। 
1. सर्दियों में चने के आटे का हलवा कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। यह हलवा वात से होने वाले रोगों में व अस्थमा में फायदेमंद होता है।
2.में राहत मिलती है। 50 ग्राम चने उबालकर मसल लें। यह जल गर्म-गर्म लगभग एक महीने तक सेवन करने से जलोदर रोग दूर हो जाता है।
3. चने के आटे की की नमक रहित रोटी 40 से 60 दिनों तक खाने से त्वचा संबंधित बीमारियां जैसे-दाद, खाज, खुजली आदि नहीं होती हैं। भुने हुए चने रात में सोते समय चबाकर गर्म दूध पीने से सांस नली के अनेक रोग व कफ दूर हो जाता हैं।
4. 25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करने से डायबिटीज दूर हो जाती है। यदि समान मात्रा में जौ चने की रोटी भी दोनों समय खाई जाए तो जल्दी फायदा होगा।
5.चने को पानी में भिगो दें उसके बाद चना निकालकर पानी को पी जाएं। शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
6. हिचकी की समस्या ज्यादा परेशान कर रही हो तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धुम्रपान करने से शीत के कारण आने वाली हिचकी तथा आमाशय की बीमारियों में लाभ होता है।
7. पीलिया में चने की दाल लगभग 100 ग्राम को दो गिलास जल में भिगोकर उसके बाद दाल पानी में से निकलाकर 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4-5 दिन तक खाएं राहत मिलेगी।
8. देसी काले चने 25-30 ग्राम लेकर उनमें 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण मिला लें चने को कुछ घंटों के लिए भिगो दें। उसके बाद चने को किसी कपड़े में बांध कर अंकुरित कर लें। सुबह नाश्ते के रूप में इन्हे खूब चबा चबाकर खाएं।
9.बुखार में ज्यादा पसीना आए तो भूने चने 50 ग्राम को पीसकर अजवायन 10 ग्राम और वच का चूर्ण 5 ग्राम मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
10. चीनी के बर्तन में रात को 20 ग्राम चने भिगोकर रख दे। सुबह उठकर खूब चबा-चबाकर खाएं इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में बढ़ोतरी होती है व पुरुषों की कमजोरी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। भीगे हुए चने खाकर दूध पीते रहने से वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है।
11.गर्म चने रूमाल या किसी साफ कपड़े में बांधकर सूंघने से जुकाम ठीक हो जाता है। 
12.बार-बार पेशाब जाने की बीमारी में भुने हूए चनों का सेवन करना चाहिए। गुड़ व चना खाने से भी मूत्र से संबंधित समस्या में राहत मिलती है। 
13.रोजाना भुने चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाता है।
भोजन में चना : रोटी के आटे में चोकर मिला हुआ हो और सब्जी या दाल में चने की चुनी यानी चने का छिलका मिला हुआ हो तो यह आहार बहुत सुपाच्य और पौष्टिक हो जाता है। चोकर और चने में सब प्रकार के पोषक तत्व होते हैं। चना गैस नहीं करता, शरीर में विषाक्त वायु हो तो अपान वायु के रूप में बाहर निकाल देता है। इससे पेट साफ और हलका रहेगा, पाचन शक्ति प्रबल बनी रहेगी, खाया-पिया अंग लगेगा, जिससे शरीर चुस्त-दुरुस्त और शक्तिशाली बना रहेगा। मोटापा, कमजोरी, गैस, मधुमेह, हृदय रोग, बवासीर, भगन्दर आदि रोग नहीं होंगे।
14. बेजड़ या मिक्सी रोटी - गेहूँ- चना-जौ : गेहूँ, चना और जौ तीनों समान वजन में जैसे तीनों 2-2 किलो लेकर मिला लें और मोटा पिसवा कर, छाने बिना, छिलका चोकरसहित आटे की रोटी खाना शुरू कर दें। इसे बेजड़ या मिक्सी रोटी कहते हैं।
15. खाज-खुजली,त्वचा संबंधित बीमारियां में फायदा - चने के आटे की की नमक रहित रोटी 40 से 60 दिनों तक खाने से त्वचा संबंधित बीमारियां जैसे-दाद, खाज, खुजली आदि नहीं होती हैं।

-- कुष्ट रोग में लाभ
अंकुरित चना 3 साल तक खाते रहने से कुष्ट रोग में लाभ होता है।
त्वचा का कालापन- लगभग 12 चम्मच बेसन, 3 चम्मच दही या दूध, थोड़ा सा पानी सभी को मिलाकर पेस्ट सा बनाकर पहले चेहरे पर मले और फिर सारे शरीर पर मलने के लगभग 10 मिनट बाद स्नान करें तथा स्नान में साबुन का उपयोग न करें। इस प्रकार का उबटन करते रहने से त्वचा का कालापन दूर हो जाएगा।

-- चेहरे का सौंदर्यवर्धक- 
चना के बेसन में नमक मिलाकर अच्छी तरह गौन्दकर लेप बना लें। इस लेप को चेहरे पर मलने से त्वचा में झुर्रियां नहीं आती हैं और चेहरा सुन्दर रहता है।
चेहरे की झांई के लिए- रात्रि में 2 बड़े चम्मच चने की दाल को आधा कप दूध में भिगोकर रख दें। सुबह दाल को पीसकर उसी दूध में मिला लें। फिर इसमें एक चुटकी हल्दी और 6 बूंदे नींबू की मिलाकर चेहरे पर लगाकर रखें। सूखने पर चेहरे को गुनगुने पानी से धो लें। इस पैक को सप्ताह में तीन बार लगाने से चेहरे की झाईयां दूर हो जाती हैं।

-- सांस नली व कफ रोग दूर- 
भुने हुए चने रात में सोते समय चबाकर गर्म दूध पीने से सांस नली के अनेक रोग व कफ दूर हो जाता हैं। 

पथरी की समस्या में चना
पथरी की समस्या अब आम हो गई है। दूषित पानी और दूषित खाना खाने से पथरी की समस्या बढ़ रही है। गाल ब्लैडर और किड़नी में पथरी की समस्या सबसे अधिक हो रही है। एैसे में रातभर भिगोए चनों में थोड़ा शहद मिलाकर रोज सेवन करें। नियमित इन चनों का सेवन करने से पथरी आसानी से निकल जाती है। इसके अलावा आप आटे और चने का सत्तू को मिलाकर बनी रोटियां भी खा सकते हो।
शरीर की गंदगी साफ करना
काला चना शरीर के अंदर की गंदगी को अच्छे से साफ करता है। जिससे डायबिटीज, एनीमिया आदि की परेशानियां दूर होती हैं। और यह बुखार आदि में भी राहत देता है।
डायबिटीज के मरीजों के लिए
चना ताकतवर होता है। यह शरीर में ज्यादा मात्रा में ग्लूकोज को कम करता है जिससे डायबिटीज के मरीजों को फायदा मिलता है। इसलिए अंकुरित चनों को सेवन डायबिटीज के रोगियों को सुबह-सुबह करना चाहिए।
मूत्र संबंधी रोग
मूत्र से संबंधित किसी भी रोग में भुने हुए चनों का सवेन करना चाहिए। इससे बार-बार पेशाब आने की दिक्कत दूर होती है। भुने हुए चनों में गुड मिलाकर खाने से यूरीन की किसी भी तरह समस्या में राहत मिलती है।
पुरूषों की कमजोरी दूर करना
अधिक काम और तनाव की वजह से पुरूषों में कमजोरी होने लगती है। एैसे में अंकुरित चना किसी वरदान से कम नहीं है। पुरूषों को अंकुरित चनों को चबा-चबाकर खाने से कई फायदे मिलते हैं। इससे पुरूषों की कमजोरी दूर होती है। भीगे हुए चनों के पानी के साथ शहद मिलाकर पीने से पौरूषत्व बढ़ता है। और नपुंसकता दूर होती है।

पीलिया के रोग में
पीलिया की बीमारी में चने की 100 ग्राम दाल में दो गिलास पानी डालकर अच्छे से चनों को कुछ घंटों के लिए भिगो लें और दाल से पानी को अलग कर लें अब उस दाल में 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4 से 5 दिन तक रोगी को देते रहें। पीलिया से लाभ जरूरी मिलेगा।
त्वचा की समस्या में
चने के आटे का नियमित रूप से सेवन करने से थोड़े ही दिनों में खाज, खुजली और दाद जैसी त्वचा से संबंधित रोग ठीक हो जाते हैं।
चने को आप खाने में जरूर इस्तेमाल करें। यह किसी दवा से कम नहीं है। चने खाने से एक नहीं कई फायदे मिलते हैं तो क्यों नहीं अंकुरित चनों का इस्तेमाल रोज किया जा सकता है। वैदिक वाटिका का प्रयास है आपके स्वास्थ के लिए हर जरूरी चीज को आप तक पहुंचाना जो आप और आपके परिवार के लिए जरूरी और फायदेमंद है।

प्रोटीन का सम्पूर्ण स्रोत- गेहूँ के जवार का रस

                         गेहूँ के जवार का  रस           
गेहूं के जवार में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट, मिनरल्स आदि वे 
सभी पौष्टिक तत्व है जो शरीर को स्वस्थ और तंदुरुस्त बनाये रखने
 के लिए जरूरी है /
गेहूं के जवारों के लिए चित्र परिणाम
लंबे और गहन अनुसंधान के बाद पाया गया है कि शारीरिक कमजोरी, रक्ताल्पता, दमा, खांसी, पीलिया, मधुमेह, वात-व्याधि, बवासीर जैसे रोगों में गेहूं के छोटे-छोटे हरे पौधों के रस का सेवन खासा कारगर साबित हुआ है.
यहां तक कि इसकी मानवीय कोशिकाओं को फिर से पैदा करने की विशिष्ट क्षमता और उच्चकोटि के एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण कैंसर जैसे घातक रोग की प्रारंभिक अवस्था में इसका अच्छा प्रभाव देखा गया है / गेहूं हमारे आहार का मुख्य घटक है. इसमें पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होती है.
गेहूं के जवारे उगाने की विधि :-
(wheat grass)
1. हमेशा अच्छी किस्म के जैविक गेहूँ के
बीज,अच्छी उपजाऊ (उर्वरक) मिटटी और
जैविक या गोबर की उम्दा खाद का ही उपयोग करें।
2. रात को सोते समय लगभग 100 ग्राम गेहूँ एक पात्र में भिगो कर रख दें।
मिटटी और खाद को अच्छी तरह मिलाकर गमलों के छेद को
पत्थर या टूटे मिटटी के गमले के टुकड़े से ढक कर गमलों में
मिटटी की डेढ़ दो इंच मोटी परत बिछा दें और
पानी छिड़क दें।
3. पहचान के लिए सातों गमलो पर एक से सात तक नंबर डाल दें।
4. अगले दिन गेहुंओं को धो, निथारकर पहले गमले में गेहूँ को परत के रूप में बिछा
दें और ऊपर से थोड़ी मिट्टी डाल दें और पानी से
सींच दें।
5. गमले को किसी छायादार स्थान जहां पर्याप्त हवा और प्रकाश आता
हो पर धूप सीधी गमलों पर न पड़े।
6. अगले दिन 2 नंबर के गमले में गेहूँ बो दीजिये और इस तरह रोज
अगले नंबर के गमले में गेहूँ बोते रहें। इनमे कभी भी
रासायनिक खाद या कीटनाषक न डाले।
7. शुरू में दो-तीन दिन गमलों को गीले अखबार से ढक दें
और गमलों में हर रोज स्प्रे बोटल से दो बार पानी दें ताकि
मिटटी में नमी बनी रहे।
8. जब गैहूँ के ज्वारे डेढ़ इंच के हो जाये तो एक बार ही
पानी देना प्रयाप्त है। गर्मी के मौसम में ध्यान रखे कि
मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और
पानी की मात्रा भी ज्यादा न हो।
9. सात दिन बाद 5-6 पत्तियां के 7-8 इन्च लम्बे जवारे हो जाये तब इन को जड़
सहित उखाड़ कर और इनकी जड़े काट कर पानी से
अच्छी तरह धो कर पीस ले और रस निकाल ले व इसका
सेवन करे।
10. जवारों के बचे हुए गुदे को आप त्वचा रोग पर मल सकते हैं।
11. नियमित रूप से जवारें लेने के लिए जैसे-जैसे गमले खाली होते जाये
खाद मिटटी बदल कर नए बीज उगाते जाएँ।
12. जब तक जवारे चाहिए तब तक इस प्रक्रिया को निरंतर दोहराते रहे। इस
तरह जवारा घर में पूरे साल भर उगाया जा सकता है। 
जवारों का रस निकालने की विधि
इन जवारों को सिल पर या मिक्सी में पिसा जा सकता है | चटनी में परिवर्तित होने के उपरांत साफ़ कपडे या चलनी से छानकर प्रतिदिन आसानी से इनका इस्तेमाल किया जा सकता है |
गेहूं के जवारों को रेफ्रिजरेटर में तीन दिन तक ताजा रखा जा सकता हैं | लेकिन एक बार इनका रस निकालने के बाद इसके रस को ज्यादा देर के लिए नहीं रखा जा सकता | ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे में इसे पीना ही होता है , नहीं तो इसकी गुणवत्ता में कमी आ जाती है |
गेहूं के जवारों के लिए चित्र परिणाम
जवारों के प्रयोग से होने वाले प्रमुख लाभ
वैसे तो गेंहू के जवारों को हर मर्ज की दवा कहा जाता है , फिर भी कुछ खास बिमारियों के इलाज में इनसे अभूतपूर्व सफलता हासिल की गई है |
1. शरीर का वजन सामान्य रखने में अहम् भूमिका
2. प्रोटीन का सम्पूर्ण स्रोत
3. शारीरिक और मानसिक बल में आशातीत वृद्धि
4. मधुमेह के रोगियों के लिए बहुत कामगर
5. पाचन शक्ति को सुदृढ़ करने में अचूक औषधि
6. रक्त का शोधन और हिमोग्लोबिन के निर्माण में सहायक
7. दाग धब्बों से छुटकारा दिलाने में मददगार
8. आक्सीजन की पर्याप्त मात्रा में मौजुदगी के कारण कैंसर मरीजों के लिए उपयोगी                                         9. इसके अलावा बवासीर , गठिया , खांसी और कई पुराने रोगों को ठीक करने में भी इससे काफी मदद मिली है |10.वृद्धावस्था की कमजोरी दूर करने में गेहूँ के जवारे का रस किसी भी उत्तम टानिक से कम नहीं, वरन् अधिक ही उत्तम सिद्ध हुआ है।                                                                                                           11. यह एक ऐसा प्राकृतिक टानिक है जिसे हर आयुवर्ग के नर - नारी जब तक चाहें प्रयोग कर सकते हैं। अंग्रेजी दवाओं - टानिकों का अधिक दिनों तक सेवन नहीं किया जा सकता, अन्यथा वे लाभ के स्थान पर नुकसान ज्यादा पहुँचाते हैं। परन्तु इस रस के साथ ऐसी कोई बात नहीं। पोषकता, गुणवत्ता एवं हरे रंग के कारण गेहूँ के पौधे के रस को ‘ग्रीन ब्लड’ की संज्ञा दी गयी है।                                                               12. गेहूँ के ताजे जवारे के साथ यदि थोड़ी - सी हरी दूब - दूर्बाघास एवं 2 - 4 दाने कालीमिर्च को पीसकर रस निकाला और उसका सेवा किया जाए तो पुराने से पुराना एलर्जिक रोग भी जड़ - मूल से नष्ट हो जाता है और शरीर में रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होकर युवाओं जैसी स्फूर्ति आ जाती है। यहाँ ध्यान रखने योग्य विशेष बात यह है कि दूर्बाघास सदैव साफ-स्वच्छ स्थानों जैसे खेत, बाग, बगीचों, की ही प्रयुक्त की जानी चाहिए। इसे भी छोटे गमलों, क्यारियों, में गेहूँ की भाँति ही उगाया जा सकता है।                           
नोट:-                                                                                 1. शुरू में रस पीने से परेशानी हो तो कम मात्रा से धीरे-धीरे मात्रा बढ़ायें।                                                                2. ज्वारे का ताजा रस सामान्यतः 60-120 एमएल प्रति दिन खाली पेट सेवन करना चाहिये।                                      3. यदि आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो 30-60 एमएल रस दिन मे तीन चार बार तक ले सकते हैं।                          4. रस निकालकर तुरंत उपयोग करें। तीन घण्टे में जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त होने लगते हैं।                          5. रस में अदरक अथवा खाने वाला पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है।                      6. इसे गिलोय, लोकी, नीम के पत्तो व तुलसी के पत्तों के रस के साथ भी मिल कर लिया जा सकता है।                        7. रस लेने के पूर्व व बाद में एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें। आधे घंटे में यह रक्त में घुल मिल जाता है।             8. रस को धीरे-धीरे घूंट घूंट करके पीना चाहिए और सादा भोजन ही लेना चाहिए तथा तली हुई वस्तुएं न खाए               9. कुछ लोगों को शुरु-2 में उल्टी-दस्त हो सकते है तथा सर्दी महसूस हो सकती है। यह सब रोगी होने के लक्षण है।     10. खटाई ज्वारे के रस में मौजूद एंजाइम्स को निष्क्रिय कर देती है। इसमें नमक, चीनी आदि भी नहीं मिलाना चाहिये।                                                                                                                                                      11. सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से ऐसा समझे की शरीर से दूषित एकत्रित मल बाहर निकल रहा है, इससे घबराने की जरुरत नहीं है।                                                                                                                                          12. इसे खट्टे रसों (नीबू, संतरा, मौसमी) आदि खट्टे रसो को छोड़कर अन्य फलों और सब्जियों के रस के साथ मिला कर भी ले सकते है। 

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